Monday, 24 April 2017

एक वचन - Hindi Poetry #1

I'm feeling happy to share this (my first poem, written by me) with all of you.
Hope you guys enjoy this....but the objective of this poem is what, that's the matter !!! 
Through this poem, I'm trying to share a message of food wastage to all of us.
Your comments,suggestions and reviews are valuable for me.
Please like, Comment and Share. #mk.

!!! एक वचन !!!


वचन करो तुम वचन करो !
न गगन से, न धरा से;
न बहती हुई इस हवा से;
आज खुद से तुम एक वचन करो !
वचन करो तुम वचन करो !
न अन्न के एक दाने से;
न खाने के एक निवाले से;
न खिलती हुई बागानों से;
आज खुद से तुम एक वचन करो !
वचन करो तुम वचन करो !
हर रात कोई भूखा सो रहा;
देखो वहाँ बच्चा रो रहा;
कोई दाने-दाने को तरसते हैं;
कोई भूख-प्यास से मरते हैं;
इन भूखे-प्यासे बच्चों के खातिर;
आज खुद से तुम एक वचन करो !
वचन करो तुम वचन करो !
एक पल की भूख मिटाने को;
लोग दर-दर ठोकरें खाते हैं;
इसी अन्न के दाने को हम;
क्यों नाले में बहाते हैं ?;
इन ठोकर खाने वालों के खातिर;
आज खुद से तुम एक वचन करो !
वचन करो तुम वचन करो !
यूँ करके बर्बाद अन्न को;
तुम खुद बर्बाद हो जाओगे;
समझो इसे चेतावनी एक या एक इशारा मान लो;
इस चेतावनी या इशारे के ख़ातिर;
आज खुद से तुम एक वचन करो !
वचन करो तुम वचन करो !
आज खुद से तुम एक वचन करो !
वचन करो, तुम वचन करो !
तुम एक नई क्रांति लाओगे!
वचन करो, तुम वचन करो !
तुम अन्न की बर्बादी को रोककर दिखाओगे,
वचन करो, तुम वचन करो !
तुम अन्न रक्षा की मुहिम फैलाओगे!
वचन करो, तुम वचन करो !
तुम राष्ट्रहित में कुछ अलग कर जाओगे !
वचन करो तुम वचन करो!
आज खुद से तुम एक वचन करो !!!

-Mitanshu kumar.

नई राह - Hindi poetry #2

Hello Friends, I'm glad to share my another poem with all of you. You all have appreciated my last poem...thank u so much for that. Hope this poem will also touch your heart. My all energy comes from you and your reviews, so comment like and share. your suggestions and reviews are heartily welcome... thank you.

!!! नई राह !!!

मन की एक आवाज़ पर;
चल पड़ा मैं उस राह;
जिस राह पे लाखों चलते हैं;
लिए हजारों चाह।
हूँ बेख़बर इस बात से,
इस भीड़ की आवाज़ से,
जो कह रहें रुक जा ज़रा,
तू क्यों चल रहा इस राह पे
ये गधों की चाल है;
ये जग का मायाजाल है;
तू खुद से अपनी राह चुन;
तुझे क्या मंजिल की दरकार है।
फिर भी चला मैं जा रहा;
अपने स्वप्नपुर्ति की आश में;
जिंदगी को त्याग कर;
जिंदगी की तलाश में।
यहां सबका एक ही हाल है
सभी चल रहें गधों की चाल हैं;
सपने अलग हैं सबके मगर;
फिर क्यों सबकी एक ही राह है।
ऐ मुसाफ़िर तू सुन ज़रा;
तू एक नई-सी राह चुन;
अपनी एक अलग पहचान दे;
करना है तुझे सबसे अलग;
तो कुछ नया अंजाम दे;
तू एक नई-सी राह चुन।
तू एक नई-सी राह चुन।।

- Mitanshu Kumar